Thursday, 3 April 2014

अज्ञात 2

कोई पूछ रहा है मुझसे मेरी ज़िन्दगी की कीमत
मुझे याद आ रहा है तेरा वो हल्का सा मुस्कुराना

एहतियातन बुझा सा रहता हूँ
जलता रहता तो राख हो जाता

कमबख्त मानता ही नहीं दिल उसे भूलने को
मैं हाथ जोड़ता हूँ तो ये पांव पड़ जाता है

मुझे लिख कर कही महफूज़ कर लो दोस्तों

तुम्हारी यादाश्त से निकलता जा रहा हूँ मैं 

जाते हुए उसने सिर्फ इतना कहा था मुझसे
ओ पागल ... अपनी ज़िंदगी जी लेना, वैसे प्यार अच्छा करते हो

हम से भुलाया ही नहीं जाता एक मुखलिस का प्यार
लोग जिगर वाले हैं जो रोज नया महबूब बना लेते हैं

हम जा रहे हैं वहाँ, जहाँ दिल की कदर हो
बैठे रहो तुम अपनी अदाएं लिए हुए

लोग सीने में कैद रखते हैं
हमने सर पर चढ़ा लिया दिल को 

न तेरी याद ,न तसव्वुर ,न तेरा ख़याल
लेकिन खुदा क़सम ,तुझे भूले नहीं है हम !!

अज्ञात

कितना आसान था तेरे हिजर में मरना जानां
फिर भी इक उमर लगी जान से जाते जाते
--अज्ञात

चेहरा बता रहा था कि बेचारा मरा है भूख से
सब लोग कह रहे थे कि कुछ खा के मर गया

--अज्ञात  


रिश्वत भी नहीं लेता कम्बख्त जान छोड़ने की,
ये तेरा इश्क तो मुझे केजरीवाल लगता हैं...

--अज्ञात 

 मुफ्त का एहसान न लेना यारो
दिल अभी और सस्ते होंगे

पूछा न जिंदगी में किसी ने भी दिल का दुःख
शहर भर में ज़िक्र मेरी ख़ुदकुशी का है ।
--अज्ञात 
याद आते हैं तो कुछ भी नहीं करने देते
अच्छे लोगों की यही बात बहुत बुरी लगती है

--अज्ञात