ग़ुस्सा भी है तहज़ीब-ए-तआल्लुक़ का तलबगार हम चुप हैं भरे बैठे हैं गुस्सा न करेंगे
कल रात बहुत ग़ौर किया है सो हम ए "जॉन" तय कर के उठे हैं के तमन्ना न करेंगे