Saturday, 31 August 2013

मच्छर को बनाएं राष्ट्रीय कीट!

भारत में हम जिस भी चीज को राष्ट्रीय महत्व से जोड़ते है, कुछ समय बाद उसका अपने आप बेड़ा गर्क हो जाता है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है लेकिन देश में कुछ लोग सिर्फ इसलिए कत्ल किए जा रहे हैं कि वे हिंदी भाषी हैं। मोर हमारा राष्ट्रीय पक्षी है मगर आज हालत यह है कि सम्पूर्ण मोर बिरादरी जेड श्रेणी की सुरक्षा मांग रही है। हॉकी के एनकाउंटर के लिए हम भले किसी  को क्रेडिट दें दे , मगर हॉकी की शहादत के पीछे असल वजह उसका राष्ट्रीय खेल होना ही है। वहीं खुद को राष्ट्रपिता का वारिस बताने वालों ने साठ साल से ' गांधी ' को तो पकड़ रखा है, लेकिन ' महात्मा ' को भूल बैठे हैं।

  मेरा मानना है कि जब यह सिद्धांत इतना सीधा है तो क्यों न हम तमाम बड़ी समस्याओं को राष्ट्रीय महत्व से जोड़ दें, वे खुद-ब-खुद खत्म हो जाएंगी। जैसे मच्छरों का भयंकर आतंक है। मेरा मानना है कि अगर हमें मच्छरों का हमेशा के लिए नामोनिशान मिटाना है तो उसे राष्ट्रीय कीट घोषित कर देना चाहिए।

सरकार घोषणा करे कि राष्ट्रीय कीट होने के नाते मच्छरों का संरक्षण किया जाए। उसे
'गंदगी बढ़ाओ, मच्छर बचाओ ' टाइप कैम्पेन चलाने चाहिए। निगम कर्मचारियों को आदेश दिए जाएं कि वे अपनी अकर्मण्यता में सुधार लाएं। जिस गली में पहले हफ्ते में दो बार झाडू लगती थी, वहां महीने में एक बार से ज्यादा झाडू न लगे। गंदगी बढ़ाने के लिए पॉलिथीन के इस्तेमाल को प्रोत्साहन दिया जाए । गटर-नालियां जितने उफान पर होंगी, उतनी तेजी से मच्छर बिरादरी फल-फूल पाएगी और प्रावधान किया जाए कि एक मच्छर मारने पर पांच साल का सश्रम कारावास और दो लाख का आर्थिक दण्ड दिया जाएगा। कानून का आम आदमी में खौफ पैदा करने के लिए ' एक मच्छर आदमी को जेल भिजवा सकता है ' टाइप थ्रेट कैम्पेन भी चलाए जाएं। इसके लिए किसी बड़े स्टार की सहायता ली जा सकती है।
किसी सिलेब्रिटी को मच्छर अम्बेसडर घोषित किया जा सकता है। आप इसे कोरी बकवास न समझें। आपको हम बताते है इससे फायदा कैसे होगा ।
इधर निगम कर्मचारियों तक जैसे ही सरकार का फरमान पहुंचा उनका खून खौल उठा। उन्होंने तय किया कि अब वे कभी अपनी झाडू पर धूल नहीं चढ़ने देंगे। जो कर्मचारी पहले सड़क पर झाडू नहीं लगाते थे, वो खुंदक में अपने घर पर भी सुबह-शाम झाडू लगाने लगे। वहीं पॉलिथीन का ज्यादा इस्तेमाल करने के सरकारी आदेश के बाद महिलाएं पति की पुरानी पैंट का थैला बनाकर बाजार से सामान लाने लगीं। शाही घरानों के़ लड़कों ने, जो पहले जंगल में शेर का शिकार करने जाते थे, अब जीपों का मुंह शहर के गटरों की तरफ कर दिया। अब वह बंदूक के बजाय शिकार पर बीवी की चप्पलें ले जाने लगे और उनसे चुन-चुनकर मच्छर मारने लगे।

 नतीजा यह होगा   के महज तीन महीने के भीतर ही योजना बुरी तरह फ्लॉप होगी  सभी जगह  पूरी तरह मच्छरों से मुक्त हो जायगी ।
योजना की असफलता से उत्साहित कुछ लोगों ने प्रस्ताव रख सकते  है कि इसी तर्ज पर भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय आचरण और दलबदल को राष्ट्रीय खेल घोषित किया जाए। इसी तरह 'अतिथि देवो भव' का स्लोगन बदलकर 'अतिथि छेड़ो भव' किया जाए। ऐसा करने पर ही इन समस्याओं से मुक्ति मिल पाएगी। 

दौलत और शोहरत की तमन्ना

दौलत और शोहरत की मुझे बरसों से तमन्ना है। वैसे भी इंसान उसी चीज़ की तमन्ना करता है जो उसके पास नहीं होती। यूं तो अक्ल भी मेरे पास नहीं है, मगर वो आ जाए ऐसी कोई ख़्वाहिश भी नहीं ! मौजुदा आमदनी में खर्च धटा दू तो अगले दस सालो में बचत होगी कुछ हज़ार रूपये ! इसी अनुपात में लोकप्रियता बढ़ी तो इन दस सालों में तीस-चालीस नए लोग ही मुझे जान पाएंगे !
मतलब ये कि मौजूदा पेस पर दस सालों में कुछ हज़ार रूपये और अपनी प्रतिभा से कायल या घायल हुए तीस-चालीस लोगों की कुल जमा-पूंजी ही मेरे पास होगी, जो मुझे कतई मंज़ूर नहीं है। मैं चाहता हूं कि जल्द ही मेरे पास लाखों रूपये हों, करोड़ों दीवाने हों, जिसमें भी दीवानियों की संख्या ज़्यादा हो,

जब मैंने अपनी ये ख्वाहिश मित्र को बताई तो उसने कहा कि इसका एक ही तरीका है, किसी रिएलिटी शो में चले जाओ। टीवी पर मेनली तीन तरह के रिएलिटी शो आते हैं। गाने का, नाचने का या अन्य किसी नायाब किस्म की मूर्खता का।
सोचने लगा कि मैं इनमें से किस रिएलिटी शो में जा सकता हूं ! जहां तक गाने का सवाल है, उससे जुड़ा मेरा और उनका, जिन्होंने मेरा गाना सुना, अनुभव अच्छा नहीं रहा।
इससे पहले कॉलेज में भी एक बार ऐसा हादसा हुआ था। मित्रों के प्रोत्साहन पर, बाद में पता चला कि उन्होंने मज़े लिए थे, मैंने सालाना फंक्शन में गायन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। जैसे ही मैंने गाना शुरू किया जनता तो जनता वहां मौजूदा कौओं तक ने अपने कान बंद कर लिए, बाग के फूल मुरझाने लगे, कुत्ते भौंकने लगे और माइक में शॉर्ट सर्किट के बाद धुंआ निकलने लगा। कार्यक्रम संचालक ने बीच गाने में आकर मेरे कान में कहा कि हम वादा करते हैं कि पहला पुरस्कार तुम्हें ही देंगे, मगर भगवान के लिए अभी-इसी वक़्त गाना बंद कर दो।
अपनी संगीत प्रतिभा को निखारने गुरु जी के पास भी गए थे , उन्होंने कहा बेटा तुम्हारे अंदर बहुत पतिभा है पर मानव जाती के कल्याण के लिए इसे दावा कर ही रखो!
ये ऑप्शन मेरी लिए ख़त्म हो गया। रही डांस की बात। तो लाख चाह कर भी उस पर चांस मारने की हिम्मत नहीं पड़ती। डांसने के लिए पैर चलने बहुत ज़रूरी है। कुछ-एक नचनिया टाइप मित्रों ने सिखाने की कोशिश भी की मगर उन्हें भी लगा कि ‘भारी न होने के बावजूद’ हिलने के मामले में मेरे पांव अंगद के समान हैं।

कौन बनेगा करोड़पति टाइप में जाने का तो सबाल ही नहीं ..इसमे ज्ञान की जरुरत है , अपने ज्ञानी होने का इल्जाम अपने सर नहीं ले सकता ! अब किसने क्या किया क्यों किया सारे जहाँ का मैंने कोई ठेका थोड़ी ले रखा है !
कुल मिलाकर दोस्तों, तय नहीं कर पा रहा हूं किस रिएलटी शो में जाऊं। आख़िर में यही लगता है कि बेमतलब बातों की अंतहीन सड़क पर आवारा-निकम्मे दोस्तों के साथ बेहिसाब दौड़ने का मेरे पास बेशुमार अनुभव है। पांव चलें न चलें, ज़बान खूब चलती है। कभी ज़बान चलाने का कोई रिएलिटी शो हो तो बताइएगा, फिर कोशिश करेंगे।

Monday, 26 August 2013

अचार



बड़े बुजुर्गो के आचार विचार पर विचार करने से हमारे अंदर बढ़ता है शिष्टाचार , जब शिष्टाचार का अचार बना डाला जाय तो वो जाता है भ्रष्टाचार ! भ्रष्टाचार को खतम करने का ठेका तो केजरीवाल बाबू के आप ने ले ही लिए है !

हम तो ठहरे ओरिजनल टाइप के आम आदमी तो हम विचार करते है अचार पर ! अचार के नाम से मुह में पानी आया न ! बड़ा ही महत्वपूर्ण है अचार हमारे जीवन में !

जब बच्चा पैदा होने वाला तो मा को अचार यानि खट्टा खाने की इच्छा होती है ! यहाँ सभी पैदा हुए होगे कोई लक्की द्र से तो निकला नहीं होगा ! यानि हमारे पैदा होने से पहले ही जो पोष्टिक आहार हमें मिला वो खट्टा ही है ! तभी तो कहा गया है जिंदगी का मज़ा तो खट्टे में है !
फिर तो जीवन में खट्टे ही खट्टे है !

जिसको चाहा उसे पटा नहीं पाए तो अंगूर खट्टे है !

साथियों को हरा कर यानी दात खट्टे कर जॉब लो !

फिर हर दिन बोस खट्टा सा मुह बना कर सामने खड़ा हो जायगा !


Sunday, 25 August 2013


कुछ चीजे रखी हुई है मेरे पास -

वो एक जिंदगी की किताब हर लफ्ज़ झूठे है जिसके ,
एक सुखा गुलाब जिसमे महक नहीं अब तो ,
कुछ कागज के पन्ने जो पीले हो चुकी है , शब्द भी बिखर चुके है जिसके ...!!...

ताख पर रखा हुआ है कुछ लम्हा जो बीतता नहीं ,
कुछ ख्वाब है मेरे तकिये के निचे जो टूटता नहीं ,
कुछ बाते जो दीवारों से गूंजती है ,

सोचता हूँ इन्हे समेट कर बहा दू दरिया में ,
दफ़न कर दूँ उनको ....
पर हर बार जब समेटने जाता हूँ इनको मैं खुद ही बिखर जाता हूँ

Sunday, 18 August 2013

मेहँदी का रंग

मेहँदी को रंग लाने  में बूटीपार्लर वाले की या मेहदी की क्वाईलिटी का दोष हो सकता है पर किसी हिसाब से किसी का भी प्यार किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं हो सकता !

पर कहा ये जाता है की "जिसका महबूब जिसको जितना प्यार करता है मेहँदी उतनी रंग लाती है "

जिसने भी ये कहा है यार खोजो तो उसको पीटना है ! ऐसा सब शगूफा बना देते है , किसी न किसी को किसी रोज मरवायगी इस तरह की बाते !!!!

प्याज

कितने महान , ज्ञानी , अंतर्यामी , थे हमारे साधू  महात्मा , भगवान बुध , महावीर........
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वो हमें हमेशा से लहसुन प्याज खाने से मना करते आये है !

उन्होंने प्याज के भविष्य को पहले ही जान लिया था !

प्याज के भाव ने हमारी आंखे खोल दी महाराज !

हम तुक्ष इंसान महापुरुषों की भविष्य की सोच और दिव्य दृष्टी को समझ नहीं पाए ! अपने इस नादाँ बालक को क्षमा करे !!!

जन्म दिन

लोगो को फेसबुक पर जन्मदिन की बधाईया बटोरते देख मेरे मन में भी सबाल उठ्ठा की मेरा ओरिजनल डेट ऑफ बर्थ क्या है ?
जब मैंने घरवालो से पुछा की मैं पैदा कब हुआ वो बोले बुधवार को , अब ये बुधवार तो हर हफ्ते आ जाता है , फिर उन्होंने दिमाग पर थोडा जोर ड़ाल कर बताया की उस साल काली गाय ने उजला बछड़ा दिया था उससे सात दिन बड़ा है तु!

मैंने कहा ये क्या बात हुई उसके आस पास की देश की कोई बड़ी दूरघटना बताये तो बाकि मैं गूगल पर सर्च कर लुगा !
उन्होंने कहा जिस दिन तुम पैदा हुए उसी दिन गाव के नए मुखिया के बाप की शादी हुए , अब ये तो गूगल का बाप भी नहीं बता पायगा की उसकी शादी कब हुई... !
मेरी तो समझ नहीं आया उनको सबसे बड़ी दुर्धटना मुखिया के बाप की शादी ही लगी ! मेरे पास अब एक क्लू तो था ! मैं मुखिया के पास गया की तेरे बाप की शादी कब हुई !

उसने कहा मुझे क्या पता मैंने कौन सा उनका कन्यादान किया था ! मैं तो उनके बारात में भी सामिल नहीं हुआ ! पर तुम्हे उनकी शादी में कोई ओब्जेसन है का ! मैंने कहा नहीं मुझे तो बस अपना डेट ऑफ बर्थ जानना था !
उसने कहा ये कौन सी बड़ी बात है तुम पंचायत ऑफिस चले जाव वहाँ सब के जनम मरण का रिकॉर्ड रहता है !
पंचायत ऑफिस में जाकर मैंने वहाँ के कर्मचारी से कहा चचा मुझे अपना डेट ऑफ बर्थ जानना है , वो बोले हाँ हाँ क्यों नहीं ! दो घंटे तक फाइल पलटने के बाद उन्होंने कहा पता चल गया बेटा !
तुम अब तक पैदा ही नहीं हुए ! मेरी तो पाँव के निचे से जमींन खिसक गयी पर तुरंत होश आया नहीं यार मैं हूँ !
मैंने कहा चाचा कैसी पागलो जैसी बाते करते हो , वो बोले मैं गलत नहीं कह रहा तुम्हारे बाप के घर कोई बच्चा पैदा नहीं हुआ ! सरकारी रजिस्टर तो यही कहते है ,
लेकिन अब तो तुम्हे पैदा होना पड़ेगा ! मेरे पास 5000 से 15000 तक के डेट है तुम किस डेट में पैदा होना चाहोगे !
मैंने कहा मैं समझा नहीं , वो बोले VVIPडेट @15000जैसे 15 AUG, 26 JAN., VIPडेट @10000.. 15AUG, 26 JAN के आगे पीछे या फिर नोर्मल @ 5000 !!
मैंने कहा मेरी डिलेवरी तो वैसे भी नार्मल ही है तो आखिर कार 5000 देकर 22 SEPTMBER का डेट मिला मुझे !!!!!

Friday, 16 August 2013

sahir ludhyanwi

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है


कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी


अजब न था के मैं बेगाना-ए-अलम रह कर
तेरे जमाल की रानाईयों में खो रहता
तेरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आँखें
इन्हीं हसीन फ़सानों में महव हो रहता


पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की
तेरे लबों से हलावट के घूँट पी लेता
हयात चीखती फिरती बरहना-सर, और मैं
घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुप के जी लेता


मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
के तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं


ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अनजानी रह्गुज़ारों से
महीब साये मेरी सम्त बढ़ते आते हैं
हयात-ओ-मौत के पुरहौल ख़ारज़ारों से


न कोई जादह-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िन्दगी मेरी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खोकर
मैं जानता हूँ मेरी हमनफ़स मगर फिर भी


कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है

ज़िन्दिगी यूं हुई बसर तनहा


 
ज़िन्दिगी यूं हुई बसर तनहा
काफ़िला साथ और सफ़र तनहा

अपने साये से चौंक जाते हैं
उमर गुज़री है इस कदर तनहा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तनहा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती नहीं बसर तनहा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर ना जाने गये किधर तनहा

आज़ादी का जशन

मना लिए आज़ादी का जश्न , हो लिया फील गुड , देख लिए परेड !

तो तैयार हो जाइये कल के अपने परेड के लिए , वही ऑफिस वही बॉस ....!

टाइम से ऑफिस पहुचने की आज़ादी फील कीजये !

बॉस का गिसा पिटा भाषण में मनमोहन सिंह को फील कीजिये !

कम्पूटर के कीबोर्ड पर इंग्लिश टाइप करते हुए तो जरुर आज़ादी फील करेगे !

चलिए सडको पर आती जाती भारतीय नारी को जींस में देखकर तो कम से कम आज़ादी फील कर ही सकते है !

ahmad faraz

इस से पहले कि बेवफा हो जाएँ
क्यूँ न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ

हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
फिर कहीं और मुब्तिला हो जाएँ

अब के गर तू मिले तो हम तुझसे
ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जाएँ


बंदगी हमने छोड़ दी फ़राज़
क्या करें लोग जब खुदा हो जाएँ
(क़बा=ड्रेस)

Thursday, 15 August 2013

Vm Bechain

मिल गई आज़ादी अब मुख्तलिफ सविंधान लिखूंगा
जा महोब्बत तिरा कभी नही गुणगान लिखूंगा

अंग्रेजो से भी बदतर निकला तेरा व्यवहार
तारीख में तुझे सौ टका बेइमान लिखूंगा

जान गया खूबसुरती के पीछे की बद्सुरती
कैसा रहा तुम्हारा सब दीन ईमान लिखूंगा

कैसी थी तेरी सोच लोग खुद समझ जाएंगे
केवल तेरा नाम जब मैं पाकिस्तान लिखूंगा

जूनून मकसद रखना किसी के इश्क का नही
माने तो नौजवानों को आहवान लिखूंगा

जमीन पर झूठ फरेब मक्कारी बढ़ गई ज्यादा
इसीलिए नही झुकता कभी आसमान लिखूंगा

तसल्ली रख थोड़ी सी बुरा दौर गुजरने दे
लिए किस किसने बेचैन सभी इंतिहान लिखूंगा

via-  (bhanu)

Friday, 9 August 2013

व्रत

एक बात समझ नहीं आती की हिंदुस्तान में सारा व्रत पत्निया ही पति एक लिए क्यों रखती है , पति पत्नी के लिए कोई व्रत क्यों नहीं रखता !

एक भी व्रत बनाया ही नहीं गया है जो पति पत्नी के लिए रख सके ! कम से कम एक व्रत तो ऐसा होता की अगर पति न रखे तो पत्नी जी के दो-चार बाल ही झड जाते ! फिर पता चलता की भगवान का भय क्या होता है !
 बेचारा आदमी हर वक्त डरा हुआ महसूस करता है की बीबी जी ने अगर किसी पुरानी छोटी मोटी बात का खुन्नस निकालने के लिए व्रत तोड़ दिया , और भगवान जी ने बात को दिल पर ले लिया तो बन्दा तो मुफ्त में गया अपनी जान से !

एक है करवा चौथ का व्रत साल भर जो पत्नी पति को जीने नहीं देती एक करवा चौथ का व्रत साला मरने भी नहीं देता ,
अब मान लीजये बीबी करवा चौथ के दिन भोजन पानी ले के बीबी बैठ जाय और कहे की नेक्लेश दिल्वाव या मैं खाना खाती हूँ , अब मरता क्या न करता , कुछ हज़ार के लिए बांदा जान का रिस्क तो नहीं ले सकता !
ऐसा खूबसूरत चांस पुरुष को भी तो मिलना चाहिए !

Thursday, 8 August 2013

कैसे ????

याद हमारी उसको भी जब आ जाती होगी ,
फिर कैसे वो खुद को समझाते होगे    ..... !! ?

युही बैठे बैठे जब खयालो में खो जाती होगी ,
फिर कैसे खुद को वो बहलाती होगी ..... !!?


सावन की रिम-झिम जब आग लगाती होगी ,
वो कैसे फिर मन की उलझन को सुलझाती होगी !!?

पायल की रूंन झुंन जब नाम मेरे दुहराती होगी ,
फिर कैसे वो खुद को मानती होगी .... !!?

अपने साजन के बाहों में छुप कर तो  वो सो जाती होगी ,
फिर दर्पण में खुद से नज़रे कैसे मिलाती होगी ....!!?

याद हमारी उसको भी जब आ जाती होगी ,
फिर कैसे वो खुद को समझाते होगे    ..... !! ?


Monday, 5 August 2013

चुनाव चिन्ह



'चुनाव चिह्न' का बहुत बड़ा महत्त्व होता है। हर चिन्ह जनता के लिए संदेश देता है। वह पार्टी, नेता और उसकी नियति का घोषणा-पत्र होता है, जिसे गाहे-बगाहे लोग पढ़ अथवा समझ पाते हैं। बाकी लोग तो बस औपचारिकता निभाते हैं। अपने वोट की बलि उस पर चढ़ाते हैं।

'कमल का फूल-
यह भक्ति का प्रतीक है, धर्म का प्रतीक है। कमल का फूल कीचड़ में खिलता है। इसके माध्यम से नेता कहता ह,ै कि तुम सब कीचड़ की तरह ही हमारे लिए रहोगे और हम चुनाव जीतकर कमल की तरह खिलकर मुस्कराएँगे और देश में कीचड़ ही कीचड़ फैलाएँगे।



हाथ का 'पंजा' - भी अपना संदेश देता है और नेताओं की नियति का बयान करता है। यदि पंजे को जिताओगे तो पाँच वषरें तक लगातार चाँटे खाओगे। पूरी ताकत हमारे हाथों में होगी और तुम सदा पछताओगे। पंजे की मार कौन झेल पाएगा, जो जिताएगा, वही सताया जाएगा।


'हाथी' का निशान खाने का प्रतीक है। हाथी जिस तरह फल-फूल, पेड़-पौधे खाता है, उसी तरह नेता भी जीतकर देश को खाएगा और पाँच वर्षों में सब कुछ पचा जाएगा। यदि कोई इसके खिलाफ आवाज उठाएगा, तो हाथी बौरा जाएगा और सूँड़ से उठा-उठाकर सबको पटखनी लगाएगा। हाथी सिर्फ अपने नेता को पीठ पर बैठाएगा और जनता को कुचलता हुआ चला जाएगा।


'साइकिल' का निशान भी अद्भुत है। साइकिल को जो जिताएगा, वह घनचक्कर बन जाएगा। पहिए की तरह नचाया जाएगा। साइकिल की तरह देश को भी नेता पंक्चर कर जाएगा।


'लालटेन' का निशान भी कुछ बताता है। नेता के चरित्र को स्पष्ट रुप से समझाता है। जिस तरह लालटेन धीरे-धीरे घासलेट पी जाती है, उसी तरह लालटेन के निशान वाला नेता पूरे देश को पी जाएगा और जनता को पता भी नहीं चल पाएगा। उजाले में लालटेन जलाएगा और अँधेरे में बुझाएँगा। जो बचेगा, उस पर घासलेट डालकर आग लगाएगा।
 
धनुष-बाण वाला नेता किसी को जीवित नहीं छोड़ेगा। एक-एक को निशाना बनाएगा और अपना तीर सबके दिल में उतारेगा। विकास को धनुष-बाण पर रखकर नर्क तक पहुँचाएगा और स्वयं स्वर्गलोक का आनन्द उठाएगा।

'ताला-चाभी' का निशान चोट्टे नेताओं से बचने का संकेत देता है। यदि इसे जिताओगे तो बहुत पछताओगे। दिमाग का ताला बंद करके चाभी आतंकियों के हवाले कर दी जाएगी। तालाबंद कंपनियों की तरह देश भी रोयेगा, किन्तु ताला खुल नहीं पाएगा।
 
'हँसियां' का निशान काटने का प्रतीक है। जिस तरह किसान फसल काटता है, अन्न खाता है उसी तरह नेता वोटों की फसल काटेगा और पूरे देश को खायेगा। यदि थोड़ा-बहुत रह जायेगा तो बेच आएगा।



इस चुनावी महासंग्राम में जनता हर तरफ से मारी ही जाएगी। देश का चीरहरण होगा और नेता दुर्योधन की तरह खिलखिलाएगा। कोई कृष्ण जनता की लाज बचाने न आएगा। वोट कितना भी समझ-बूझकर दो, अन्त में राज्य धृतराष्ट्र ही चलायेंगे।