Sunday, 25 August 2013


कुछ चीजे रखी हुई है मेरे पास -

वो एक जिंदगी की किताब हर लफ्ज़ झूठे है जिसके ,
एक सुखा गुलाब जिसमे महक नहीं अब तो ,
कुछ कागज के पन्ने जो पीले हो चुकी है , शब्द भी बिखर चुके है जिसके ...!!...

ताख पर रखा हुआ है कुछ लम्हा जो बीतता नहीं ,
कुछ ख्वाब है मेरे तकिये के निचे जो टूटता नहीं ,
कुछ बाते जो दीवारों से गूंजती है ,

सोचता हूँ इन्हे समेट कर बहा दू दरिया में ,
दफ़न कर दूँ उनको ....
पर हर बार जब समेटने जाता हूँ इनको मैं खुद ही बिखर जाता हूँ

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