Saturday, 12 October 2013

होर्न बजाना

अभी सड़क जाम में फसा हुआ था तो एक बंधू पीछे से पो पो टे टे होर्न बजाए जा रहे थे , मन तो हुआ उतर कर पहले तो उनके कान के निचे दो बजा के दू फिर कहूँ अकल के अंधे दिमाग से पैदल तू गाड़ी से चलता क्यों है पैदल ही चला कर न !

मैं यहाँ कोई पार्क में टहलने निकला हूँ या मुझे शौक है धीरे धीरे चलने का , मोटर साइकिल में ऐसा गियर भी नहीं होता की उड सकू !

फिर अचानक उसके लिए मन में घनी सहानभूति हो आई की शायद उसकी की पहले से बजी पड़ी हो , देश की जो हालत है आम आदमी की तो बजते ही बजते रहती है , या फिर बेचारे की उसकी बीबी ने जस्ट जम कर बजायी हो , और भला आदमी होर्न के शोर में खुंद की शांति तलाश कर रहा हो !

फिर समझ आई होर्न की महत्ता ये बस के इसी चीज़ है जिसे दबा कर आदमी अपना फ्रसटेसन निकल सकता है , टेटेटेटेटे .... की आवाज में एक सुकून है , वरना तो बचपन से इंसान को हमेशा से दबाया ही जाता है ! एक बच्चा जिसकी दिमाग थोडा तेज है वो टोपर बन जाता है , इसमे बच्चे की क्या गलती , गर्ल फ्रेंड / बॉय फ्रेंड के लिए भी सुन्दर दिखना जरुरी है ... सुन्दर न होना किसी की गलती नहीं !

नियति कही न कही हर किसी को दबा ही देती है ... तो क्या हुआ कोई अपनी भड़ास होर्न बजा कर निकल ले तो ...!

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