एक गजल उसपे लिखू दिल का तकाजा है,
खुद से बिछड़ जाने पे ये घड्का है बहुत ।
रात हो दिन हो गफलत हो या की बेजारी हो ,
उसे देखा तो नहीं कभी पर सोचा है बहुत ।
मेरे हाथो की लकीरों में इजाफा गवाह है ,
मैंने पत्थर की तरह खुद को तरासा है बहुत।
खुद से बिछड़ जाने पे ये घड्का है बहुत ।
रात हो दिन हो गफलत हो या की बेजारी हो ,
उसे देखा तो नहीं कभी पर सोचा है बहुत ।
मेरे हाथो की लकीरों में इजाफा गवाह है ,
मैंने पत्थर की तरह खुद को तरासा है बहुत।
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