Tuesday, 5 August 2014

मेरी जिन्दगी की डायरी ।

मेरी जिन्दगी की डायरी ।

कवार्फ़ पीले पड़ चुके है जिसकी ...

पर लफ्ज सुरक्षित है अब भी ...

कुछ पन्ने फट चुके है , वो जो किस्से का हिस्सा था अब वी नहीं है ।

एक गुलाब दवी है मगर जो सूख चुकी है । खुशबु मगर अब भी है उसमे ।

कुछ कोरे भी है पन्ने जो कहती है लिखेगी कुछ नयी कहानी के अल्फाज जिंदगी ।।

No comments:

Post a Comment