Thursday, 19 September 2013

बच्चे

हर किसी के अंदर एक बच्चा हमेशा रहता है जो विवश कर देता है इस तरह की  हरकते करने के लिए जो नहीं करना  चाहिए !

वो बच्चा हम बडो की दुनिया देख कर बड़ा होना ही नहीं चाहता !

लेकिन अब सोचता हूँ बच्चो की दुनिया भी कम मुसीबत नहीं है ,  अभी किसी बच्चे को स्कूल जाते देखता हू तो लगता है सुबह ६ बजे जागना कोई आसान काम तो नहीं है , उसपर अपने वजन से ज्यादा का बेग लाद कर ,  पुरे शहर का चक्कर लगते हुए स्कूल पहुचना , फिर नन्ही सी जान के लिए २ का पहाडा याद करना किसी पहाड से कम तो नहीं है ! हमसे ज्यादा व्यस्त है बेचारा !

हमारा जमाना कुछ और ही था हम तो गाव के स्कूल में पढ़े , आज के बच्चो की तरह नहीं थे की बस आई और चढ गए ! हम तो इज्जत के भूखे थे , स्कूल जाते नहीं थे बुलाए जाते थे , वो भी एसे नहीं चार लड़के घर आते थे और मुझे उठा कर ले जाते , गुरु जी पहले से गेट पर स्वागत के लिए खड़े रहते थे !

२१ तोपों की जगह छड़ी से सलामी दी जाती थी तब क्लास रूम जाते थे !

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