Monday, 16 September 2013

नाई

सैलून में किसी बच्चे को बाल कटवाते देखता हूँ तो

उस हाहाकारी सन्डे के भयावह मंज़र के बारे में सोचने लगता हूँ जब पिता जी मुझे लेकर नाइ के पास ले जाते थे ! भले से चेहरे होठो पर मुस्कान लिए हाथ में कैची के कारण किसी जल्लाद से कम तो नहीं दीखता था !

बच्चे  तो बच्चे है मामूली टोफ़ी के लिए अपनी गर्दन किसी को तो नहीं सौप सकते भाई !

बचपन से आज तक भी समझ नहीं आई की नाइ का कान में क्या इंटरेस्ट है ,पूरा टाइम देते है कान के पीछे ! पता नहीं उन्हें क्या मज़ा आता है कान के निचे कैची बजाने में , क्या हो साबित करना चाहते है की उनमे वो हुनर है की किसी की भी कान काट सकते है !

और गर्दन की सामत आनि तो पक्की है , ऊपर निचे दाये बाये ... अब गर्दन में स्प्रिग तो लगा नहीं है , मन तो होता है मुन्डी खोल के दे दू ले यार तुझको जो करना है कर ले हो जाय तो लौटा देना ! पर ऐसा सिस्टम है नहीं खोपड़ी में !
अब तो मुसीबत और बढ़ गयी जब दाढ़ी बनानी पड़ती है ! गले और अस्तुरे के बिच बस भगवान ही होता है , अगर नाई से किसी बात की खुन्नस हो गयी हो तो भगवान भी नहीं होता , बस नाई के ही रहमो करम पर है आप तो समझिए !
हम जैसो के लिए तो एक मुसीबत और है गर्दन से ज्यादा प्यारी मुछ है , वो कट गयी तो नाक काटने का खतरा है !

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