Tuesday, 26 November 2013

काम

जब बेराजगार थे तो चैन में थे ' बाप का खाते थे चैन की बंसी बजाते थे ; ऐसा नहीं था आने वाले कल की थोरी चिंता थी मगर काम करने पर पता चला कल की कल की बात है यहाँ तो साली आज ही नाम में दम किये रहती है !

बाप जी के धर्म खाते से लेपटोप खरीद लाए थे तो लगा था ये कमाल की चीज़ है ! अब दिनभर टक टकी लगाये हुए सारा दम  कुर्सी पर बैठे बैठे पिछवाड़े में जमा हो जाता है ! दिन भर के किचिर किचिर में शाम होते होते कुछ बचता नहीं ! जो बचता है उसे  पूर्णतया आदमी तो नहीं कहा जा सकता !

कौन कहता है की काम करने के लिए पढ़ा लिखा ग्रेजुएट होना चाहिए मैं तो यही समझा है काम  करने के लिए एक गधा चाहिए बस एक गधा !
तजुर्बे की कह रहा हूँ कुछ दिनों पहले एक कम्पनी में मुलाजिम के तोर पर कम किया बस गधे की तरह कम करते जाव यही डीजिग्नेसन थी अपनी ! फिर उसे छोड कर अपना छोटा सा काम शुरू किया सोचे अपना बॉस हम खुद होगे पर साहब हालत इसी हो गयी की गधे से कुत्ते होगे ! वो भी धोबी के !

अब समझ आया मुलाजिब भी धोबी का गधा बॉस भी घोबी का कुत्ता ! घोबी इनके बिच इसलिए आ जाता है क्योकि दोनों को धोना बहुत आसान है ! मुलाजिम गधे को तो कम से कम खाना तो नसीब होता है ! धोबी का कुत्ता तो घर का न घाट का !

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