उसकी बेरुखी पर जी चाहता है ,
चार शायरी हम भी पेल दे ग़ालिब !
अर्ज़ है
उसकी बेरुखी पर जी चाहता है ,
चार शायरी हम भी पेल दे ग़ालिब !
फिर सोचता हूँ जाने दो क्यों बिलावजह खोपड़ी खपाए !!!!
चार शायरी हम भी पेल दे ग़ालिब !
अर्ज़ है
उसकी बेरुखी पर जी चाहता है ,
चार शायरी हम भी पेल दे ग़ालिब !
फिर सोचता हूँ जाने दो क्यों बिलावजह खोपड़ी खपाए !!!!
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