Wednesday, 12 March 2014

शायरी 3

एक शायरी अर्ज करता हूँ सम्भालियेगा।
मतलब खुद संभालिये गा।

ख्वाबो की चादर है खयालो का बिछौना नींद सी तुम हो।

गौर फरमाये ।
खाबो की चादर है खयालो का बिछौना और नींद सी तुम हो।

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ख्वाब ख्याल और तुम वाह वाह ।

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मच्छर की भन भन सी तेरी बाते और खटमल सी चुभाती तेरी यादे जो बस सोने नहीं देती।
क्या बात
क्या बात
क्या बात

तश्रीफ़
तारीफ भी खुद से ही करनी पड़ती है।

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बस ये डिसाइड नहीं कर पा रहा हूँ मैं ज्यादा धटिया लिखता हूँ या वो है जो लास्ट तक पढ़ रहे है।

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