ऐसा
कहा जाता है कि प्रेम के बाद विवाह हो जाता है। प्रेम विवाह के बाद जिंदगी
में बहुत ही खुशियां आती हैं। पर ऐसा तब ही हो पाता है, जब प्रेम किसी से
हो, और विवाह किसी और से हो। क्योंकि जानकारों का कहना है कि जिसके साथ
विवाह किया हो, उसके साथ प्रेम करना बहुत मुश्किल हो जाता है। किसी कवि ने
उचित ही ऐसी आशा व्यक्त की है कि आओ, आओ हम ऐसे प्यार करें, ऐसे प्यार
करें, जैसे हमने कभी शादी की ही न हो।
प्रेम ...जीवन को सुधारता है, कईयों के जीवन के स्तर को। वैलंटाइन कार्ड बनाने वाली कंपनियों के स्तर को, इन्हे बेचने वालों के स्तर को, वैलंटाइन डे की गिफ्ट बेचने वालों के स्तर को। कुल मिलाकर प्रेम से कई जीवन स्तर सुधरते हैं, सिवाय प्रेमी के जीवन के। प्रेमी का स्तर लगातार खराब होता जाता है, क्योंकि आजकल प्रेमोपयोगी आइटम बहुत ही महंगे हो गये हैं। अच्छा आईलवयू कार्ड सौ रुपये से कम में नहीं आता है। एक अच्छे मल्टीप्लेक्स में प्रेमिका को फिल्म दिखाने में कम से कम तीन सौ रुपये खर्च हो जाते हैं।
प्रेम की यही कलाकारी है, कि जो कटता है, वह भी नहीं मानता कि वह कट रहा है। पर किसी की जेब कटती है, तब ही तो किसी की जेब भरती है। यही प्रकृति का उसूल है। लैला-मजनूं टाइप का प्रेम तब ही संभव हो पाया, जब वैलंटाइन कार्ड कंपनियां नहीं थी, तमाम गिफ्ट कंपनियां नहीं थीं। अब तो लैला मजनूं के सामने इतने आइटमों की लिस्ट पेश कर देती कि मजनूं उनकी कीमत देखकर ही कह उठता –हे लैला तुम्हारी डिमांड पूरी करने से आसान है-मर जाना। सो मुझे मर जाने दो। पर लैला कहती-डीयर, पहले ये सारे आइटम रख जाओ, फिर चाहे, जीओ चाहे मर जाओ।
धन से बड़ा कुछ भी नहीं है, प्रेम भी नहीं, क्योंकि प्रेम भी बगैर धन के नहीं हो सकता है। कवि बाबा नागार्जुन ने गलत नहीं कहा है-पीयो संत हुगली का पानी, पैसा सच है दुनिया फानी।
प्रेम ...जीवन को सुधारता है, कईयों के जीवन के स्तर को। वैलंटाइन कार्ड बनाने वाली कंपनियों के स्तर को, इन्हे बेचने वालों के स्तर को, वैलंटाइन डे की गिफ्ट बेचने वालों के स्तर को। कुल मिलाकर प्रेम से कई जीवन स्तर सुधरते हैं, सिवाय प्रेमी के जीवन के। प्रेमी का स्तर लगातार खराब होता जाता है, क्योंकि आजकल प्रेमोपयोगी आइटम बहुत ही महंगे हो गये हैं। अच्छा आईलवयू कार्ड सौ रुपये से कम में नहीं आता है। एक अच्छे मल्टीप्लेक्स में प्रेमिका को फिल्म दिखाने में कम से कम तीन सौ रुपये खर्च हो जाते हैं।
प्रेम की यही कलाकारी है, कि जो कटता है, वह भी नहीं मानता कि वह कट रहा है। पर किसी की जेब कटती है, तब ही तो किसी की जेब भरती है। यही प्रकृति का उसूल है। लैला-मजनूं टाइप का प्रेम तब ही संभव हो पाया, जब वैलंटाइन कार्ड कंपनियां नहीं थी, तमाम गिफ्ट कंपनियां नहीं थीं। अब तो लैला मजनूं के सामने इतने आइटमों की लिस्ट पेश कर देती कि मजनूं उनकी कीमत देखकर ही कह उठता –हे लैला तुम्हारी डिमांड पूरी करने से आसान है-मर जाना। सो मुझे मर जाने दो। पर लैला कहती-डीयर, पहले ये सारे आइटम रख जाओ, फिर चाहे, जीओ चाहे मर जाओ।
धन से बड़ा कुछ भी नहीं है, प्रेम भी नहीं, क्योंकि प्रेम भी बगैर धन के नहीं हो सकता है। कवि बाबा नागार्जुन ने गलत नहीं कहा है-पीयो संत हुगली का पानी, पैसा सच है दुनिया फानी।
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