आज
सुबह सुबह एक अपराध हो गया , न जाने कहा से रूम साफ करने का ख्याल दिमाग किसी कोने
में चरमराया और हम झाड़ू लेकर वीर पुरुष की भाति कूद पड़े मैदान में ! अपराध इसलिए
की धुल की सोहबत से तो पहले से ही मुझे परहेज नहीं आखिर एक दिन राख ( धुल ) में ही
तो मिल जाना है !
रूम
साफ करना समस्या नहीं थी ! पर रेक पर पड़े किताबो के ऊपर पड़ चुके मोटी मोटी धुल की
परत देख कर थोडी शर्म आ गयी ! आलस्य के आगे शर्म थोडी ढक जाती है पर बड़ा वाला
बेशर्म तो मैं हूँ नहीं !
किताबो
पर परत इतनी मोटी थी की एक एक को कपडे से
साफ करते हुए हम सोच रहे थे यार इसे कब खरीदी? मेरे ख्याल से किताबो का भी मेरे
प्रति ख्याल कुछ ऐसा ही होगा क्या इसी ने खरीदी ? इंग्लिश में लिखी कुछ किताब ने
तो पूछ भी लिया की आखिर क्या सोच कर मैंने उसे खरीदा था ! कुछ ने व्यंग कसा की जब
खरीद ही लिए थे तो नया समझ कर ही सही पलट भी लिया होता !
कुछ
पुरानी लिखी हुई कापी भी थी जिसे देख कर तसल्ली हुई की थोडा को ही बहुत मान कर सही
कभी कभी पढ भी लिया करते थे ! पर वहाँ भी कापी में बच गयी खाली पन्नों ने तंज किया
की आखिर मैंने क्या अपराध किया था जो मुझे कोरा ही छोड़ गए आज मिले हो तो जरा बता
दो !
जबाब
क्या देते ?
मैं
तो शर्म से पानी पानी हो गया ! पानी की कमी को पूरी करने के लिए दो ग्लास पानी
पी लिए और कर भी क्या सकते थे !
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