समाज का एक लुप्तप्राय प्राणी है "भला आदमी " ! इसके बारे में अकसर कहा जाता है बेचारा भला आदमी ,
ये बेचारा इसलिए होता है क्योकि इसके पास कोई चारा नहीं होता और भला आदमी बन जाता है ! इसके सामने किसी की हिम्मत नहीं होती की इसे गलत आदमी बता दे !मेरी राय में तो मिस यूनिवर्स की तरह मिस्टर भला अथवा मिस्टर जेन्टलमैन प्रतियोगिता होना चाहिए !
आइये नज़र डालते है कुछ भले आदमी पर !
भले होने के अनेक कारण हैं। पहला कारण तो मेरी आर्थिक विषमता है। ये एक अभिशाप हो सकता है पर स्थिति दयनीय होने से भलेपन का तमगा तो लग ही जाता है !धनाढ्य का भला बने रहना कठिन है , गरीब होने का ये फायदा है आचरण में शुद्धता बनी रहती है !हलाकि गरीबी की सीमारेखा के नीचे वालों के तो नखरे ही न्यारे हैं। दो रूपये किलो का गेहूँ और तीन रूपये का चावल खाकर मद में चूर हैं।
मौटे तौर पर मेरे भले होने का दूसरा कारण शारीरिक रूप से कमजोर होना भी है , भुजा में ताकत आज के युग में परम आवश्यक है !जो अच्छे से अच्छा च्वनप्राश खा कर भी शारीरिक रूप से संपन्न नहीं हो पता उसके निरीहता को अंत में भले मानुष का नाम दे दिया जाता है !कभी कभी तो किसी की शारीरिक संरचना ही ऐसी होती है जिसे देखते ही भला आदमी घोषित कर दिया जाता है !
इसे सरकारी संरक्षण की आवश्यकता है , वृहत पैमाने पर इसका शिकार किया जा रहा है
ये बेचारा इसलिए होता है क्योकि इसके पास कोई चारा नहीं होता और भला आदमी बन जाता है ! इसके सामने किसी की हिम्मत नहीं होती की इसे गलत आदमी बता दे !मेरी राय में तो मिस यूनिवर्स की तरह मिस्टर भला अथवा मिस्टर जेन्टलमैन प्रतियोगिता होना चाहिए !
आइये नज़र डालते है कुछ भले आदमी पर !
भले होने के अनेक कारण हैं। पहला कारण तो मेरी आर्थिक विषमता है। ये एक अभिशाप हो सकता है पर स्थिति दयनीय होने से भलेपन का तमगा तो लग ही जाता है !धनाढ्य का भला बने रहना कठिन है , गरीब होने का ये फायदा है आचरण में शुद्धता बनी रहती है !हलाकि गरीबी की सीमारेखा के नीचे वालों के तो नखरे ही न्यारे हैं। दो रूपये किलो का गेहूँ और तीन रूपये का चावल खाकर मद में चूर हैं।
मौटे तौर पर मेरे भले होने का दूसरा कारण शारीरिक रूप से कमजोर होना भी है , भुजा में ताकत आज के युग में परम आवश्यक है !जो अच्छे से अच्छा च्वनप्राश खा कर भी शारीरिक रूप से संपन्न नहीं हो पता उसके निरीहता को अंत में भले मानुष का नाम दे दिया जाता है !कभी कभी तो किसी की शारीरिक संरचना ही ऐसी होती है जिसे देखते ही भला आदमी घोषित कर दिया जाता है !
भले आदमी बनने की विवशताएँ कुछ भी हो सकती हैं, लेकिन इसमें मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती। अब भला रूप मेरी तो हर प्रकार से सहायता करता है। मैं शालीनता को तहेदिल से अपनाये हुए हूँ, सबसे अच्छा व्यवहार रखता हूँ, मीठा बोलता हूँ, तो मेरे काम भी बन ही जाते हैं। जब काम बन जाता है, उल्लू सीधा हो जाता है तो भला बने
रहने में भला आपत्ति क्या है ? मौहल्ले में सब
मेरा सम्मान करते हैं, ऐसा मुझे लगता है। भले आदमी की अपनी मुसीबतें हो सकती हैं, लेकिन यह इमेज बनाने के बहुत काम आता है। महिलायें मानती हैं कि भला आदमी है, इससे बात करने में
कोई हर्ज नहीं है। इसलिए इस क्षेत्र में
थोड़ा-बहुत स्कोप मुझे कई बार आशा की किरण की तरह कौंधता दिखाई देता है।
चाहे जो हो, भलापन मैं छोड़ूँगा नहीं। किसी तरह गिनीज बुक में मेरा नाम दर्ज भले आदमी के रूप में हो जाये, इसकी जुगाड़ में मैं आजकल लगा हुआ हूँ। भला आदमी खोजने मैं जाऊँगा नहीं, क्योंकि दूसरा मिल गया तो ‘मुझसे भला न कोय' का अर्थ क्या रह जायेगा।
इसे सरकारी संरक्षण की आवश्यकता है , वृहत पैमाने पर इसका शिकार किया जा रहा है
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