ओढनी , चुनरी , दुपट्टा कभी ये कन्या के तन ढकने की सामग्री
हुआ करती थी , फिर कुछ दिनों तक गर्दन में टंगी दिख जाती थी मगर अब तो वहाँ से भी
बिलुप्त होती नज़र आती है !,
सामने वाली को लगता होगा की वो दिखने में अच्छी लग रही है ,
देखने में भी अच्छा लगता है , पर देख कर अच्छा नहीं लगता!! ,
कमजोर हू इसलिए सरीफ हूँ या सरीफ हूँ इसलिए कमजोर हूँ ये तो
पता नहीं , पर निहायत सरीफ होने के कारण लड़की में बेटी , भतीजी , बहन देखने की
कोशिश करता हूँ , दिमाग खुद को इतनी गन्दी गाली देता है जो कह भी नहीं सकता !!
नारी स्वतंत्रता के खिलाफ मैं नहीं , शुरुआत नारी ने कपड़ो
से की है इसमें भी इतराज नहीं, कर भी नहीं सकता ! अपने दिल और दिमाग की सराफत
बनाये रख सकू बस इतनी सी आरजू है !!!!!
No comments:
Post a Comment