Friday, 10 May 2013

भैया की शादी



 कुछ लोगो की बातों से प्रेरित L ( सत्य कथा )

बात ये है की मेरे एक भाई साब शादी कर रहे है 12- 05- 2013 को, भैया जी बिजनेस मैन है भाभी जी डॉक्टर , हलाकि भैया जी इन्जिनिर की पढाई की है मगर आज कल उसकी वेलु क्या है ? तो कुछ लोग कहते है लंगूर के हाथ हूर लग गयी!!!! ,( मेरा ऐसा मानना बिलकुल नहीं है !)

भैया जी भले आदमी है आप काज महाकाज समझ कर बस अपने काम से काम रखते है , अपनी नींद सोते अपनी नींद जागते , न उधो से लेना न माधो का देना !

पता नहीं हूर ने उनमे क्या देखा होगा , शायद शक्ल पर ध्यान न देकर उसने अक्ल को परखा होगा उन्हें अक्ल का अंधा पाकर उनपर फ़िदा हो गयी होगी ! या सोच रखा होगा कि शादी उसी से करो जिसे जिन्दगी भर मुठ्ठी में रख सको।
बस फिर क्या था उस हूर ने झटपट हमारी बहन (जो उनकी भी बहन है और डॉक्टर भी है ) से दोस्ती गाँठ ली और रोज घर आने लगी।और माँ-बाबूजी की लाडली बन गई। कुछ ही दिनों में आग और घी का मेल हो गया। "आई मौज फकीर की, दिया झोपड़ा फूँक"

अभी तो उनकी दसो ऊँगली घी में है पर भूल गए है सर कढाई में है , लेकिन सावन के अंधे को तो हर तरफ हरा हरा ही दीखता है ! अपनी किस्मत पर इतराते है और सोचते है  कि  बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले ना भीख।

तो भैया जी ओखली में सर दिया तो मूसलो से क्या डरना" के अन्दाज में आ गये। परसो शादी भी हो ही जायगी , ये दुर्घटना यादगार घटना में बदल जायगी ! फिर तो वो भाभी जी की मुट्ठी में बंद भुगते रहो उनको !

शायद साल भर बाद उनकी समझ में आये कि लंगूर के हाथ में हूर  फँसती नहीं बल्कि हूर ही लंगूर को फाँस लेती  हैं।  कई बार पछतावा भी होगा  पर अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।

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