Monday, 20 May 2013

दर्द से साक्षात्कार



सबेरे जगा तो सर में दर्द ने घनी तूफान मचा राखी थी सीधी शब्दों में कहे तो सर दर्द था ! अब मुझे सहानभूति देने वाला तो कोई है नहीं सहानभूति के मामले में भी आत्मनिर्भर ही होना पड़ता है ! और कहे भी तो क्या दर्द दिखाई भी तो नहीं देता , दर्द को दिखना चाहिए अब बुखार होता है तो दीखता है , हड्डी टूटती है तो वो भी दीखता है , खून निकले तो नज़र आती है फिर दर्द क्यों नहीं दीखता ! ऐसा भी नहीं है जो दीखता नहीं वो होता नहीं ! तो आज दर्द को पकड़ा और उससे कुछ बात चीत की !!!!

मैंने कहा क्यों दर्द डार्लिंग तुम तो आजकल मुझे भूल ही गयी, आज मेरी याद कैसे आगई , बहुत दिनों बाद आई हो कहो क्या लोगी चाय या ठंढा ?
दर्द बोली बस मुलाकात का मुड हुआ चली आई कोई मनाही है क्या !और हाँ  मैं कुछ लेती नहीं मैं तो बस देती हूँ !

मैंने कहा जानेमन शुक्रिया तेरे आने का पर इतना नखरा भी ठीक नहीं , पुराना यार हूँ तुम्हारा थोडा मुस्करा भी लिया करो ?
दर्द बोली मुझे मजाक बिलकुल भी पसंद नहीं !

मैं – चलो ये बताव तुम दिखती क्यों नहीं ?
दर्द – मैं हर जगह हर तरफ हूँ , दिखने लगी तो लोग जी नहीं पायगे !

मैं – क्या तुम्हे कभी हसी आती है ?
दर्द – हाँ आता है न तीसरी बार प्यार में नाकाम आशिक को रोते देख कर बहुत हसी आती है ? फिर उसी की शादी की सालगिरह पर हसी आती है !

मैं – क्या तुम्हे दर्द होता है ?
दर्द – जब कोई बच्चा या गरीबी का मारा कोई भी भूखे पेट सो जाता है तो मुझे रात भर नींद नहीं आती बहुत दर्द होता है !

मैं – यानि दर्द को भी तकलीफ होती है ?
दर्द – होती है न जब तुम जैसा कोई कमीना मुझे भी इंजॉय करना शुरू कर देता है बहुत तकलीफ होती है , तू मर मैं चली !!!

मैं – रुको रुको और भी सबाल है , रुको तो सही !

चली गयी !!!!!!

नोट – कमाल की बात ये है जब लिखना शुरू किये थे तो सर में दर्द थी अब नहीं है , कोई इस बात पर यकी नहीं करेगा पर कसम से झूठ नहीं कह रहा थी अब नहीं है !



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