एक राष्ट्रीय प्रश्न है “और क्या हाल है “ जिसका अन्तर्राष्ट्री उत्तर है “ सब बढ़िया” है। इसके अतिरिक्त कोई और
दूसरा
जवाब शायद बना ही नहीँ है । इस प्रश्न के माध्यम से परिचित व्यक्ति
अपने कर्तव्य का निर्वाह कर लेता है और दूसरा व्यक्ति भी संक्षिप्त उत्तर देकर
अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो लेता है ।
वास्तव मेँ ना तो पूछने वाले की मँशा ही हाल जानने की होती है और ना ही बताने
वाले की । जब आमना सामना हो गए तो पुछ लिए, यह एक परम्परा सी बन गई है ।।
यदि उससे पूछ ही लिया
जाय कि भैया
अपने हाल बढ़िया करने के लिये आपने क्या
नीति अपना रखी है तो शायद ही कोई सँतोषजनक उत्तर मिले
और फिर सब लोग यह सोचकर की वार्तालाप लम्बा हो जायेगा विस्तार मेँ पूछते भी नहीँ है क्योँकि सब लोग “सब बढ़िया है”
इस उत्तर से ही सँतुष्ट हो जाते हैँ कि उनकी आशा के अनुरूप ही उन्हेँ उत्तर
मिल गया और
दोनोँ अपने अपने रास्ते चल देते हैँ ।
वैसे पूछने वाला ये भलीभाँति समझता है कि ‘सब बढ़िया” है कहने वाला झूठ बोल रहा है आज के इस दौर मेँ सब बढ़िया हो ही
नहीँ सकता, अगर सब
बढ़िया है तो दाल में कुछ काला जरुर है ।
अक्सर मुझसे भी यह प्रश्न
किया जाता रहा है और मैँ भी हमेशा ही “सब बढ़िया है” कहकर परम्परा
का निर्वाह कर दिया करता था किंतु जब हाल ही मेँ मेरे एक
परिचित ने जब इस प्रश्न का पुन: प्रसारण किया गया तो प्रश्नकर्त्ता को यहीँ आशा
थी कि मैँ “सब
बढ़िया” है” कहकर अपने दायित्व से
मुक्त हो जाऊँगा और हो भी सकता था
लेकिन उस दिन ‘सत्यमेव जयते” सिर पर सवार हो गया था और मैनेँ हकीकत बयान कर ही
दी ।
मैनेँ मुँह बनाकर उत्तर दिया - ”हाल तो ठीक नहीँ है “।
” क्योँ
क्या हुआ ? उनके
ऊपर जैसे बिजली गिर गई थी । उन्हेँ मुझसे ऎसे उत्तर की आशा नहीँ थी । उन्हेँ यह विश्वास
करना मुश्किल हो रहा था कि मेरे भी
हाल खराब हो सकते है । जैसे मैँ किसी दूसरे ग्रह का प्राणी हूँ
और मेरे हाल बढ़िया
के अलावा घटिया हो ही नहीँ सकते ।
उसके माथे पर चिंता
की लकीरेँ उभर रहीँ थीँ । ये लकीरेँ मेरे
बुरे हाल के कारण नहीँ थी बल्कि मेरा हाल क्यूँ बढ़िया
नहीँ हैँ यह जानने के लिये कम और उसे कुछ देर तक अपना काम-धाम छोड़कर उसका वर्णन सुनने के लिये रुकना पड़ेगा, इस कारण अधिक थीँ । आज वो फँस गया था ।
मन ही मन वो पछता रहा था कि हाल क्योँ पूछ लिया , अच्छा
भला अपने काम से जा रहा था । ये तो बड़ा बेशर्म किस्म का प्राणी निकला कि अपना हाल बढ़िया नहीँ बता रहा है, खराब बता रहा है । अपने आप को बड़ा सत्यवादी समझता है ।
मैँने क्रमश: को एक ओर धकेलते हुए कहा ”कुछ नहीँ बाथरूम
मेँ फिसल
कर हड्डी मे फ्रेक्चर हो गया है ,, डॉक्टर ने चलने फिरने से मना किया है ।
“अच्छा
! अरे अरे ! यह तो बहुत बुरा हुआ’ । उसने खेद प्रकट किया ।
फिर उसने एक सर्वे रिपोर्ट प्रस्तुत की
जिसमेँ बताया गया था कि उसके परिवार या
रिश्तेदारोँ मेँ या परिचितोँ मेँ कौन कौन, कब कब और कहाँ कहाँ
बाथरूम मेँ फिसलकर
अपनी हड्डी तुड़वा चुके हैँ तथा उनका क्या हश्र हुआ था। यदि वह चाहता
तो “ बाथरूम
मेँ फिसलने के कारण एवँ हड्डी टूटने की सँभावनाएँ”
विषय
पर शोध भी कर सकता था । उसकी याददाश्त तथा फिसलकर हड्डी
तुडवाने वालोँ के प्रति उसकी रुचि के बारे मेँ जानकर मैँ उसके इस शौक का प्रशँषक
हो गया था। तात्पर्य
यह था कि बाथरूम मेँ फिसलकर गिरने की घटना कोई अनोख़ी घटना नहीँ थी इतिहास गवाह था कि
हर देश, हर
राज्य, हर
जिले मुहल्ले तथा
परिवार मेँ ये घटना घट चुकी है और लोगोँ की हड्डियाँ टूट चुकीँ हैँ ।
”बाकी
हाल तो बढ़िया हैँ ना ? उसने
फिर पूछा ।
खाने पीने के लाले पड़े है कहे का बढ़िया यार ।
इस कथन के जबाब में
एसी बात कही जो अकसर लोग कहते है “ किसी अच्छे
डॉक्टर को दिखा लो” ।
उसकी इस बात पर पहले तो मेरा मन हुआ कि उसकी
हत्या कर दूँ फिर इस परम वाक्य का यही अर्थ निकलता है कि मैँ अभी तक किसी बुरे
डॉक्टर को ही दिखाता रहा
हूँ तथा मैँ किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाना ही नहीँ चाहता हूँ ।
वो इस वाक्य को बोलकर मुझसे छुटकारा पाने
की कोशिश कर ही रहा था कि मैंने फिर
उसे धर लिया और उससे ही पूछा –
यहाँ अच्छा डॉक्टर कौन है ?
आपको तो
जानकारी होगी क्योँकि आप तो हड्डी तुड़वाने वालोँ के सम्पर्क
मेँ रह चुके हैँ
।
वह बगलेँ झाँकने लगा । उसे इस प्रश्न की
भी आशा नहीँ थी । उसे तो इलाज के इस महायज्ञ मेँ बस अपनी आहुति ही देनी थी ।
“ अच्छा
चलता हूँ” यह
कहकर वह अपना स्कूटर स्टार्ट करने लगा किंतु चलते चलते फिर एक भारी भूल कर बैठा। परम्परा के
अनुसार वह जाते जाते कह उठा “ और कोई
काम हो तो बताना”
।
मैँ इसी वाक्य की प्रतीक्षा कर रहा था ।
“हाँ यार
काम तो है” ।
बडी मेहरबानी होगी यदि तुम होटल से टिफिन रोज़ ऑफिस जाते समय यहाँ पहुँचा दो और
शाम को वापस जाते समय खाली टिफिन वहाँ पहुँचा देना । तुम्हेँ परेशानी तो होगी पर . . . .।
उसने ना चाहते हुए भी बुरा सा मुँह
बनाकर “हाँ
पहुँचा दूँगा” इसमेँ
परेशानी की क्या बात है” कह ही
दिया । जाने क्यूँ उसकी आवाज़ कुछ भर्रा रही थी ।
दो तीन दिन तक तो टिफिन समय पर आता रहा, लेकिन वह कुछ बात
नहीँ करता था चुपचाप दे कर चल
देता था तथा “ और अब क्या हाल है”
जैसा भी कुछ बोलता नहीँ था । फिर तीसरे दिन
उसका फोन आया कि वह किसी रिश्तेदार की शादी मेँ बाहर जा रहा है इसलिये कुछ
दिनोँ तक टिफिन पहुँचाने का कार्य नहीँ कर पायेगा आप कोई दूसरा इंतज़ाम कर
लीजिये ।
मेरे घर आने वाले मेरे मित्र जब जब भी
यह वाक्य कहते थे कि “कोई
काम हो
तो बताना” मैँ
उन्हेँ उनकी इच्छा की कद्र करते हुए काम बता दिया करता था । किसी से दूध मँगाता तो किसी से सब्जी, तो किसी से दवाईयाँ ।
सबके रिश्तेदारोँ की शादियाँ एक साथ ही
आ गईँ हैँ । अब
यदि कोई मिलने आता भी है तो बाकी लोग उसको पहले से ही सावधान कर देते
हैँ वहाँ जाकर “ और
क्या हाल हैँ ? या
“कोई
काम हो तो बताना” बिलकुल भी
नहीँ कहना, नहीँ
तो फँस जाओगे ।
No comments:
Post a Comment