Wednesday, 15 May 2013

फेसबुक की लत



जब से फेसबुक की लत लगी है न दिन में चैन न रात में नींद , दिमाग रूपी आकाश में पोस्ट , लाइक , कमेन्ट के मेघ घुमड़ते रहते है ,परेशां रहते है की आज तो ले दे के लिख लिए कल क्या लिखेगे ! रोज रोज आखिर लिखे भी तो क्या ? पर ज्योंही आज बीतता है और कल आता है कि कुलबुलाहट शुरू हो जाती है। तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा और अंगुष्ठ याने कि सारी की सारी उँगलियाँ रह-रह कर कम्प्यूटर के कीबोर्ड की ओर जाने लगती हैं। जब तक एक पोस्ट ना लिख लें, चैन ही नहीं पड़ता।

इधर घर वाले भी परेसान रहते है की घर का कोई काम नहीं करता यहाँ तक की साग- सब्जी तक लेने नहीं जाते , पर फेसबुक के लत ने मुझे  इतना बेशर्म बना दिया है की हमें कोई फर्क नहीं पड़ता जिसे जो कहना है कहे !
ऐसा भी नहीं हो पाता कि पोस्ट लिख लेने के बाद हम घर के काम-धाम में जुट जायें क्योंकि हर दो-तीन या पाँच मिनट में:

अंदाज अपना आईने में देखते हैं वो
और ये भी देखते हैं कोई देखता ना हो

के तर्ज में पर देखना रहता है कि लाइक  आई कि नहीं, और आई तो कितनी आई हैं? कमेन्ट  आती हैं तो मन विभोर हो जाता है, हम आत्म-मुग्ध हो जाते हैं, भीतर ही भीतर वैसा ही कुछ होने लगता है जैसे कि तीन पैग पेट के भीतर चले जाने पर होता है।

और यदि एक भी टिप्पणी ना मिले तो.... भगवान न करे ऐसा हो !

आसमां वाला जमीं वाले की सुनता कहाँ है और प्रायः एक भी कमेन्ट  ना मिलने वाली स्थिति ही रहती है। कमेन्ट ना मिलने पर मन मायूस हो जाता है। खुद से कहने लगते हैं - 'थू  है तुझपर जो एक ऐसा पोस्ट नहीं लिख सकता जिसमें कमेन्ट  आयें, अब पता चला तुझे तेरी औकात! डूब के मर जा चुल्लू भर पानी में।'
पर अपने आप को आखिर धिक्कारा भी कब तक जा सकता है इसलिये यही सोचकर तसल्ली दे लेते हैं अपने आपको कि लोगों में इतनी अकल नहीं है जो हम जैसे महान  व्यंगकार  के पोस्ट को समझ पायें। जब पोस्ट को समझेंगे ही नहीं तो भला कमेन्ट  कहाँ से करेंगे?

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