Friday, 10 May 2013

अग्रेजी अखबार



मेरे शुभचिंतक ने मुझे अग्रेजी सिखने के लिए अग्रेजी अखबार पढ़ने को कहा , ऐसा नहीं था की मैं पहले अग्रेजी अखबार खरीदता नहीं था , जी जब भी सफर में होता अग्रेजी अखबार ही खरीदता क्योकि इसका चिकना वाला पन्ना बचपन से मझे आकर्षित करता है , दूसरा कोई मागता भी नहीं , तीसरा पन्ने ज्यादा होते है तो बिछा के सोने के लिए सुबिधा जनक है !!

पर इसबार उसे पढ़ने की ठानी कठिन शब्दों को लिखने के लिए रजीस्टर भी ले आया , ये सोच कर खुद को हिम्मत भी दी की सोचो रिपोटर ने गली गली खाख छान कर रिपोर्ट बनाये होगे , कोई गलती न रह जाय एडिटर ने एक एक रिपोर्ट को ३६ बार पढ़ा होगा , महापुरुषों, कन्याओ,ने कितनी हसरत से तस्वीर खिचवाई होगी , बड़ी बड़ी कम्पनियों ने भी पाठक को लुभाने के लिए लाखों का विज्ञापन दिया है। तुम इतने बेगैरत नहीं हो सकते की इसे पढ़ो भी नही , कम से कम उस गरीब भेंडर की खातिर तो पढ़ लो जो रोज समय से अखबार पहुचा जाता है !!

ये सोच कर की थोडा जेनरल नालेज भी बढ़ जायगा पूरी हिम्मत करके सम्पादकीय पढ़ने बैठ जाता , एक तो करेला ऊपर से नीम चढा , अपने पल्ले तो कुछ पड़ना नहीं था , एक एक शब्द को उठा कर दिमाग पर मरता दिमाग पर पड़ते ही शब्द बिखर जाते सिर्फ अक्षर दिमाग में घुस पता , कोई शब्द अगर पूरा चला जाता तो कसम से इन्कलाब जिन्दाबाद के नारे लगाने का मन करता था, पर पूरा वाक्य तो कभी समझ ही नहीं पाया , 


पूर्णतः मैं अपनी गलती भी नहीं मानता क्योकि वाक्य में कुछ शब्द तो एसे होते थे जिसको राइटर  ने वहाँ पर क्यों डाला बस वही समझ सकता है , कुछ दिनों में मुझे तो लगने लगा राइटर कुछ कठिन शब्द रोज कही से लिख लेता है की आज


इसे कही न कही चिपकाना है , समझने वाले समझते रहे इसका मतलब क्या निकलेगा!! 
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खैर मेरी हिम्मत तो जबाब दे गयी , अग्रेजी को बुरा कह भी नहीं सकता क्योकि बुरा कहने में भी शर्म आती है , मगर ये नहीं समझ पाता कि ये शर्म भाषा न सीख पाने की है या उस भाषा के अंग्रेज़ी होने की!


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