शाम को टहलते हुए पूर्ब प्रेमिका मिल गयी , हलाकि मुझे छोढ़ते वात्क्त उसने सिर्फ दोस्त बताया था , मैं पहचान नहीं पाया खून पिए हुए मछर सी फूल गयी थी हलाकि खाते पीते घर से तो पहले से ही थी , उसके गालो की लाली से एह्शास हुआ कुछ दिनों पहले उसके पति से मिला था तो उसका चेहरा क्यों पीला पड़ा हुआ था .
उसने कहा पहचना नहीं मैं हूँ आज कल फ बी पर मुझपर खूब शायरी करते हो ,
मैंने गार्दन झूका कर कहा नहीं वो दूसरी है , तुम्हारे
वियोग से आर्थिक , सामाजिक , मानसिक फायदे के साथ एक फायदा और हुआ कुछ पूरानी शायरी समझ आने लगी!
उसने कहा बहुत तरक्की पर हो इतनी जल्दी दूसरी पटा ली मेरे टाइम में तो प्रपोज करने में बहुत टाइम लगाया था , यहाँ तक की पहल मुझसे ही कारवाया था , मुझसे सुन्दर है क्या ? खैर मुझपर लिखते हो ये सोच कर पढ़ लेती थी , अब वो भी नहीं पढुगी!
मैंने कहा तुम्हारे
बाद कोई दूसरी बेबकुफ़ मिली नहीं न , जो नहीं मिली उसी को याद करके शायरी करता हूँ , पर जो व्यंग लखता हूँ वो तो तुम्हारी याद में लिखता हूँ!
No comments:
Post a Comment