एक
मित्र ने पुछा व्यंग क्या है ?
मैंने
कहा जो सच्चाई के करीब है वो व्यंग है ! जिसमे सच्चाई नहीं मेरे हिसाब से वह हास्य
या कुछ और है पर व्यंग तो कदापि नहीं है !
फिर
पुछा व्यंग का सच्चाई से क्या सम्बन्ध ?
मैंने कहा जो एकात सच्चे हैं वो सच्चे नहीं और जो सच्चे नहीं
भी हैं वे सबके सब सच्चे ही
हैं। इस प्रकार हिंदुस्तान में सब सच्चे हैं और हर जगह सच्चाई
ही सच्चाई है।
बेमानों की बढ़ती जनसंख्या पर इससे बढियाँ और क्या व्यंग्य हो सकता है ?
वे बोले हम तो व्यंग्य का मतलब अब तक यही समझते थे कि जो
गुदगुदाए, जिसे
पढ़कर मजा आ जाये।
हमने कहा कि व्यंग्य जब दूसरे पर किया गया हो तब तो गुदगुदायेगा ही। वैसे यह रुला भी सकता है, अंदर तक हिला भी सकता है। सत्य की सराहना सभी करते हैं पर पसंद कम ही करते हैं।इसीलिए कई लोग व्यंग्य और व्यंग्यकार से चिढ़ते हैं। लेकिन व्यंग्यकार से चिढ़ने की नहीं बचने की जरूरत है।
सबाल आया व्यंगकार से बचने की जरुरत क्यों है ?
इनकी गिनती निम्न
कोटि वाले रचनाकारों में होती है। कई विद्वान तो
व्यंग्यकार को रचनाकार ही नहीं मानते।क्योंकि एक सच्चा व्यंग्यकार किसी को नहीं
बख्शता। क्या दोस्त,
क्या दुश्मन,
क्या अपना, क्या पराया,
क्या नेता, क्या अभिनेता,
क्या महात्मा, क्या धर्म यहाँ तक की स्वयं को भी नहीं ।
आरोप लगाया गया की
व्यंगकार हर जगह कमी देखते है ,उनकी नज़र बुराई पर जाती है !
जबाब था लोग चाहे करे
कुछ भी मगर हमेशा अच्छा दिखाना, बताना और सुनना भी चाहते हैं। लेकिन हर नंगे को दिगम्बर तो नहीं कहा जा सकता। नंगे को
व्यंग्यकार नंगा तो
कहता ही है साथ ही यह भी कह देता है कि
कपड़े के पीछे सभी नंगे होते हैं। जो सच्चाई है। तो
इसमें क्या बुरा है ?
किसी ने पूछ लिया व्यंगकार करते क्या है ?
गणित में जीरो या शून्य होता है। उससे चाहे जो टकराये शून्य
ही बना देता है। यही
हाल व्यंग्यकार का भी है। किसी ने यहाँ तक कहा है कि किसी लड़की को किसी व्यंग्यकार
से शादी नहीं करना चाहिए।
किसी लड़की को एक लडके से प्रेम हो गया। लड़की को यह नहीं पता
था कि यह छोटा-मोटा
व्यंग्यकार है। अन्यथा इसके चक्कर में क्यों पड़ती ? एक दिन लड़की ने लड़के से अपनी
सुंदरता के बारे में दो शब्द कहने को कहा। लड़का बोला कि आप की सुंदरता का क्या
कहना। आप तो छछुंदर से भी कहीं अधिक सुंदर हैं। लड़की फूट-फूट कर रोई। और
इन्हें छोड़कर किसी दूसरे से प्रेम करने लगी। यह स्थिति है व्यंग्यकारों
की।
सच कहा जाय तो कोई चाहे लाख कोशिश कर ले लेकिन व्यंग्यकार से नहीं बच सकता। क्योंकि हिंदुस्तान की आज वह हालत हो गई है कि यहाँ का हर प्राणी चाहे वह छोटा हो चाहे बहुत बड़ा हो अपने आप में एक व्यंग्य बन गया है। ऐसे में कोई व्यंग्यकार से कैसे बचेगा ?
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